Friday, June 25, 2010

यंत्रों की माया

उन्नति के बढ़ने के साथ साथ लोगों की समस्याएँ बढती जा रही हैं..........धैर्य घटता जा रहा है,भक्ति और श्रद्धा अंधविश्वास में बदलती जा रही है,परिणाम स्वरुप ज्योतिष जैसी विधा, जो चमत्कारपूर्ण दिखती है ,का प्रचलन शिखर पर पंहुंच गया है......मुश्किलों से निकलने के लिए ज्योतिष में सबसे पहली चीज़ समस्या को समझना है तथा तब जाकर उसके अनुसार उपाय ढूंढना है.....ज्योतिषी के अन्दर जितनी सात्विकता होगी और जितना ही व्यक्ति के तत्वों को वह समझ पायेगा उतना ही सही निर्णय ले पायेगा कि व्यक्ति को मन्त्रों का प्रयोग करवाना है,रत्नों का या रंगों का .......या अति विशेष दशाओं में यंत्रों का ......जहाँ तक मन्त्रों और रत्नों की बात है इसके बारे में विज्ञान काफी हद तक उन्नत है और इसके ज्ञान का काफी प्रचार प्रसार हो चुका है इसलिए एक ज्योतिषी से अपेक्षा की जायेगी कि वह मन्त्रों और रत्नों का सुझाव ठीक ही देगा ....और इसके शुभ-अशुभ परिणामों से परिचित होगा.....
परन्तु यन्त्र के विज्ञान की दशा और इसका रहस्य अभी भी काफी हद तक अज्ञात है ....बहुत ही कम अंशों में इसपर प्रमाणिक साहित्य उपलब्ध है और जो है भी उसमे भी ज्यादातर भ्रामक और सतही है......यंत्रों का ज्ञान अभी भी परंपरा से ही मिल सकता है और इसका मुख्य भाग यानी निर्माण और प्रयोग अभी भी रहस्य में है.........................................
तमाम समस्याओं के निवारण के लिए बाज़ार में तमाम यन्त्र उपलब्ध हैं जो थोक भाव में सोने,चांदी या ताम्बे की प्लेटों पर छाप दिए जाते हैं या लोकेट में जड़ दिए जाते हैं....समस्याओं के निवारण के लिए इन्ही नकली यंत्रों का प्रयोग होता है और खूब होता है ....जैसे अगर धन की समस्या है तो श्री यन्त्र,दुर्घटना के लिए दुर्घटना नाशक यन्त्र,ग्रहों के लिए नवग्रह यन्त्र आदि ...इन यंत्रों से लाभ तो हो ही नहीं सकता , इनको बेचने वाले दुकानदार का भले ही थोडा सा लाभ हो जाए ,पर ये सिवाय सजावटी चित्र के और कुछ भी नहीं हैं,सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये है कि तथाकथित ज्योतिषी लोग स्वयं ही इन सजावटी यंत्रों को दूकान से खरीदते हैं और फिर उच्चतम दामों पर बेचते हैं......यंत्रों का निर्माण , प्रयोग और विकास एक बड़ी रहस्यमयी प्रक्रिया है और जहाँ तक मुझे परंपरा से ज्ञात है , हर यन्त्र के निर्माण का वर्ष में अलग अलग समय और मुहूर्त होता है जो केवल कुछ ही समय का होता है और उसी में उस यन्त्र का निर्माण स्थापना,शोधन,और जागरण होता है.....यंत्रों का निर्माण करने वाला व्यक्ति प्रकाश , ज्यामितीय और मन्त्रों का ज्ञाता होना चाहिए .......जैसे श्री यन्त्र अगर केवल एक व्यक्ति ही बनाये जो हर प्रकार से इसके लिए योग्य हो तो वर्ष में केवल एक ही शुद्ध श्री यन्त्र बना सकेगा.......इस प्रकार देखा जाए तो इस प्रकार का सिद्ध व्यक्ति ही मिलना मुश्किल है और मिल भी गया तो अपने पूरे जीवन काल में १० से ज्यादा यन्त्र नहीं बना सकता .....तो फिर प्रकार बाकी बिकने वाले यन्त्र शुद्ध और सिद्ध होंगे ये तो बेचने वाला ही जानता होगा ....यन्त्र बेचने वाले और यंत्रों की चर्चा करने वाले तो ये तक नहीं जानते कि श्री यन्त्र में अलग अलग बिंदु क्या कर सकते हैं और अगर एक भी बिंदु गलत हुआ या श्री यन्त्र उल्टा रक्खा गया तो फायदे (जो कभी नहीं होता) के बजाय नुकसान हो सकता है और गंभीर नुकसान हो सकता है.....................
वर्तमान यंत्रों का सच यही है .....जो आज ज्योतिषियों की गैर जिम्मेदारी और लोलुपता से इस तरह लोगों के शोषण का अस्त्र बन गया है कि यन्त्र विज्ञान शोध के बजाय अर्थशास्त्र का विषय बन गया है..........................
शैलेन्द्र पाण्डेय

Wednesday, March 17, 2010

नवरात्रि और नवदुर्गा

नवरात्रि वर्ष में चार बार मनाई जाती है....हममे से ज्यादातर लोग केवल दो नवरात्रियों से ही परिचित हैं .....एक है चैत्र नवरात्रि (जो मार्च अप्रैल में आती है) और दूसरी है आश्विन नवरात्रि (जो सितम्बर अक्टूबर में आती है ).....इसके अलावा दो और भी नवरात्रियाँ हैं जो माघ (जनवरी) और आसाढ़ (जून-जुलाई) में आती हैं .......माघ और आसाढ़ की नवरात्रियों को गुप्त नवरात्रि कहा जाता है.......
जहाँ तक नवदुर्गा की बात है .....सबसे पहले शक्ति की ही उपासना शुरू हुयी और उस काल के मानव ने जिन जिन चीज़ों में कुछ विशिष्ट देखा उन सबको एक एक शक्ति का नाम दिया और पूजा उपासना की......नवदुर्गा शक्ति और शरीर के विभिन्न चक्रों को तो दर्शाती ही है ,साथ ही साथ यह नौ तरह की औषधियों से भी सम्बन्ध रखती है.....मूल रूप से इन दैवीय गुण संपन्न औषधियों को ही अलग अलग शक्तियों और चक्रों के साथ जोड़कर नव दुर्गा या नौ देवियों का नाम दिया गया.....
यह नौ औषधीय पदार्थ हैं -
१-केला २-कचु ३-हल्दी ४-जयन्ती ५-अशोक ६-बेल ७-अनार ८-मान और ९-धान
इन्ही से देवियों का और चक्रों का सम्बन्ध भी जोड़ा गया क्योंकि इन नौ औषधियों के प्रयोग से मन और शरीर दोनों को स्वस्थ रक्खा जा सकता है ......जो लोग धर्म को कर्मकांडी कहकर इसकी आलोचना करते हैं ,उन्हें यह समझना चाहिए की प्राचीन ऋषियों ने हर चीज़ को ईश्वर माना है और उसके गुणों को स्थापित करने के लिए नाना प्रकार की व्यवस्थायें की हैं.......नव दुर्गा शरीर के चक्र की अभिव्यक्ति भी है और नौ अद्भुत औषधियों की भी.....

शैलेन्द्र पाण्डेय

Wednesday, March 10, 2010

ज्योतिषी कौन है ?

ज्योतिष का अर्थ है ......ज्योति यानी प्रकाश ,इस प्रकार ज्योतिषी का अर्थ हुआ जो प्रकाशमान हो ......और दूसरों को भी अपने ज्ञान के प्रकाश से रास्ता दिखा सके......वर्तमान समय में ज्योतिषी वह व्यक्ति है जो जाति से ब्राह्मण हो (हालांकि यह मुख्य शर्त नहीं है ),धोती कुरता या कुरता पायजामा पहनता हो .......तिलक लगाता हो ......शिखा रखता हो .....और तमाम श्लोक, मंत्र गिना सकता हो......उसका पहनावा और दिखावा निश्चित हो ....चाहे उसके अन्दर मर्यादा ,आध्यात्म,आचरण और शुचिता हो, या न हो ........
आचार्य वराहमिहिर ने ,जो की ज्योतिष के प्रणेता थे ,ने एक ज्योतिषी होने की तमाम शर्तें बताई हैं......जिनमे मूल रूप से आचरण और संस्कारों की बात ही कही गयी है ......वराहमिहिर ने कोई " ड्रेस कोड" नहीं बताया है......अहंकार तो सर्वथा त्याज्य है उनकी परिभाषा में ......जबकि वर्त्तमान समय के माननीय ज्योतिषी किसी व्यक्ति के भविष्य के बारे में ऐसे चुनौतियां देते हैं मानो उन्होंने ही उस व्यक्ति का जीवन नियत किया है और जनता यह समझती है ज्योतिषी तो स्वयं भगवान का सोलह कला युक्त अवतार है और वह उसके जीवन की तमाम समस्याओं को नष्ट कर देगा ...........जनता और ज्योतिषी दोनों ही ज्योतिष जैसे महान पराविज्ञान के महत्व को समझे बिना इसका प्रयोग कर रहे हैं और असफलता की दशा में एक दूसरे पर दोषारोपण भी कर रहे हैं....
कहाँ हैं आध्यात्मिक और वैज्ञानिक ज्योतिषी और कहाँ है वह जनता जो इस बात को समझ सके ?

Friday, March 5, 2010

राशियों की समस्या

लगभग १०-१२ सालों से ज्योतिष के क्षेत्र में काम करते हुए सबसे पहले यही समझ आया कि , ज्योतिष जैसा आम आदमी का विज्ञान ,किस तरह से लोगों की मुश्किलें कम करने के बजाय लोगों कि मुश्किल बढ़ा रहा है इसमें सबसे बड़ी मुश्किल राशी समझने की है....एक आदमी सामान्यतः तीन तरह की राशियों के प्रभाव में होता है.......पहली जो उसकी जन्म तिथि और जन्म समय पर आधारित होती है यानी कि चन्द्र राशी ,दूसरी जो केवल जन्म तिथि पर आधारित होती है यानी कि सूर्य राशी और तीसरी जिसमे तिथि और समय से कोई लेना देना नहीं होता ,जो नाम पर आधारित होती है यानी कि नाम राशी समाचार पत्रों और टीवी चैनलों में राशी फल दिखाया जाता है जिसमे आम आदमी की खूब रूचि होती है ,परन्तु वह अपनी तीन राशियों में से किसको सही माने और क्या समझे .....यह समझ नहीं आता.... जहाँ तक मेरे ज्योतिषीय अनुभव की बात है ,चन्द्र राशी का गणित थोडा मुश्किल जरूर है परन्तु उसका फल ज्यादा सटीक और सही होता है ,इसलिए राशिफल देखने के लिए पहले अपना जन्म समय और तिथि जानकर चन्द्र राशी की गणना करवा लें और उसी के आधार पर राशिफल देखें या शुभ अशुभ का निर्धारण करें .......राशी फल कहीं भी हो कैसी भी लिखी हो आप केवल अपनी चन्द्र राशी ही देखें.....अगर आपको अपनी जन्म तिथि और समय का ज्ञान नहीं है तब आप अपनी नाम राशी का ही प्रयोग करें .....और इसके लिए उसी नाम को चुनें जो ज्यादा पापुलर यानी प्रसिद्द हो......

शैलेन्द्र पाण्डेय